Drs to Smart Umpiring आजकल के cricket में अंपायर के काम को आसान और दिये गये किसी गलत फैसले को बदलने की अनुमति भी देते हैं। पर कुछ दशक पहले ऐसा नहीं था।
क्रिकेट में अंपायर का फैसला हमेशा अंतिम माना जाता था। लेकिन 1990 के दशक से पहले तक अंपायरिंग पर पक्षपात (biased umpiring) के आरोप आम थे।
विदेशी टीमों को अक्सर लगता था कि घरेलू अंपायर उनके खिलाफ फैसले दे रहे हैं। टीवी प्रसारण के विस्तार और खेल की बढ़ती लोकप्रियता के साथ इन विवादों ने क्रिकेट की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए।
यही वह समय था जब ICC (International Cricket Council) ने अंपायरिंग को आधुनिक बनाने के लिए बड़े और ऐतिहासिक कदम उठाए।
न्यूट्रल अंपायर का आगमन: निष्पक्षता की शुरुआत
1980 और 1990 के दशक में कई विवादों ने ICC को अंपायरिंग सिस्टम बदलने के लिए मजबूर किया।
- विदेशी टीमों ने घरेलू अंपायरों पर पक्षपात के आरोप लगाए।
- 1987 में इंग्लैंड के कप्तान माइक गैटिंग और पाकिस्तान के अंपायर शाकूर राणा के बीच विवाद ने दुनिया का ध्यान खींचा।
1992: पहला न्यूट्रल अंपायर
ICC ने 1992 में एक ऐतिहासिक नियम लागू किया — हर टेस्ट मैच में एक न्यूट्रल अंपायर होना जरूरी होगा।
- पहला न्यूट्रल अंपायर: Dickie Bird (इंग्लैंड)
- मैच: भारत vs जिम्बाब्वे, हरारे, 18 अक्टूबर 1992
2002: दोनों अंपायर न्यूट्रल
2002 में ICC ने एक और बड़ा कदम उठाया:

- दोनों ऑन-फील्ड अंपायर न्यूट्रल होंगे
- ICC Elite Panel बनाया गया
इससे क्रिकेट में निष्पक्षता का नया युग शुरू हुआ।
मैच रेफरी सिस्टम: अनुशासन का नया दौर
साल 1991 ने ICC ने मैच रेफरी की भूमिका की शुरुआत की।
मैच रेफरी का काम
- खिलाड़ियों के व्यवहार पर नजर रखना
- अनुशासनात्मक कार्रवाई करना
- विवादों का अंतिम फैसला देना
पहले मैच रेफरी:
Mike Smith (इंग्लैंड के पूर्व कप्तान)
इस कदम ने क्रिकेट में अनुशासन और नियंत्रण को मजबूत किया।
टेक्नोलॉजी का प्रवेश: तीसरे अंपायर से DRS तक
टीवी तकनीक के विकास ने अंपायरिंग में क्रांति ला दी।
1992: तीसरे अंपायर की शुरुआत
- रन-आउट फैसलों के लिए वीडियो रिप्ले का उपयोग
- बाद में कैच और बाउंड्री फैसलों में भी इस्तेमाल
नई तकनीकें शामिल हुईं
- Hawk-Eye (Ball tracking)
- Hot Spot (Infrared detection)
- Snickometer (Edge detection)
- Stump Mic
इससे गलत फैसलों की संख्या कम हुई।
2008 सिडनी टेस्ट विवाद: DRS की जरूरत महसूस हुई
2008 में भारत vs ऑस्ट्रेलिया सिडनी टेस्ट में कई गलत फैसले हुए।
- एंड्रयू साइमंड्स को गलत Not Out दिया गया
- राहुल द्रविड़ और सौरव गांगुली को गलत Out दिया गया
इस विवाद ने ICC को Review System लागू करने के लिए प्रेरित किया।
2009 में DRS का आधिकारिक उपयोग शुरु हुआ। DRS के तहत खिलाड़ी अंपायर के फैसले को चुनौती दे सकते हैं।इस दौरान Hawk-Eye, Hot Spot, Snickometer का उपयोग होता है। इस तकनीक ने अपायर के फैसलों को 94% से बढ़ाकर 98% तक सटीक कर दिया।
आधुनिक क्रिकेट में अंपायरिंग: आज का सिस्टम
आज अंपायरिंग पूरी तरह हाई-टेक हो चुकी है:
- Elite Panel of Umpires
- Match Referee System
- Third Umpire
- DRS
- Hawk-Eye, Hot Spot, Snickometer
अब हर फैसला कई कैमरों और तकनीक से जांचा जाता है।
ICC ने पिछले 30 वर्षों में अंपायरिंग को पूरी तरह बदल दिया है। न्यूट्रल अंपायर, मैच रेफरी और DRS ने क्रिकेट को अधिक निष्पक्ष और पारदर्शी बना दिया है। आज तकनीक की मदद से गलत फैसलों की संभावना बेहद कम हो गई है और क्रिकेट पहले से ज्यादा भरोसेमंद और आधुनिक बन चुका है।
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